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रजवाड़ों की विरासत, आज भी जीवंत: गोवा के राष्ट्रीय लोकोत्सव में गूंज उठी 800 वर्ष पुरानी भांड–बहरूपिया कला

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गोवा खबर : रजवाड़ों के समय से चली आ रही राजस्थान की ऐतिहासिक भांड–बहरूपिया कला एक बार फिर अपनी जीवंत प्रस्तुति से लोगों का दिल जीतती नजर आई। गोवा कला अकादमी, पणजी में आयोजित राष्ट्रीय लोकोत्सव में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के बारू गांव से आए पिता–पुत्र की जोड़ी दुर्गा शंकर भांड और विक्रम भांड इस पारंपरिक लोककला को नए रंग और नई ऊर्जा के साथ प्रस्तुत कर रही है। रोजाना बदलते रूप, सजीव अभिनय और जनसंपर्क शैली के कारण ये दोनों कलाकार पूरे उत्सव में दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

यह वही खानदानी भांड कला है, जिसकी जड़ें करीब 800 वर्ष पुरानी मानी जाती हैं और जो कभी राजमहलों से लेकर जनसाधारण तक मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करती थी। पौराणिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और समसामयिक पात्रों को सजीव रूप में प्रस्तुत करने वाली यह कला आज भी लोगों को हँसाने, सोचने और संस्कृति से जोड़ने का काम कर रही है।

राष्ट्रीय लोकोत्सव का आयोजन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर एवं गोवा सरकार के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। इसी क्रम में इन बहरूपिया भांड कलाकारों को विशेष आमंत्रण देकर गोवा बुलाया गया है। उत्सव के दौरान ये कलाकार परिसर में घूम-घूमकर आम लोगों के बीच जाकर अभिनय कर रहे हैं, जिससे पूरा आयोजन स्थल एक लाइव थिएटर में तब्दील हो गया है। दर्शक न केवल इनके अभिनय का आनंद ले रहे हैं, बल्कि इनके साथ सेल्फी लेने को भी उत्सुक दिखाई दे रहे हैं।

तीन पीढ़ियों की विरासत
कलाकार विक्रम भांड बताते हैं कि यह कला उनके परिवार की खानदानी धरोहर है। “यह भांड कला हमारे परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। कई पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन इस कला से हमारा नाता कभी नहीं टूटा। हमने इस विरासत को न छोड़ा और न ही छोड़ेंगे,” – ऐसा कहते हुए उनकी आंखों में गर्व साफ झलकता है।

विक्रम भांड के दादाजी छगनलाल जी भांड अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बहरूपिया कलाकार हैं, जिन्होंने इस कला को देश ही नहीं बल्कि अमेरिका, लंदन, जापान, दुबई सहित कई देशों तक पहुंचाया। उन्हीं की बदौलत भांड कला को अंतरराष्ट्रीय मंच मिला। वर्ष 2025 के राष्ट्रीय लोकोत्सव में दादा, पिता और पुत्र – तीन पीढ़ियां एक साथ मंच पर नजर आई थीं, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण था। हालांकि इस वर्ष उत्सव में पिता–पुत्र की जोड़ी को ही आमंत्रित किया गया है, लेकिन उनकी प्रस्तुति में वही पारिवारिक संस्कार और अनुभव झलक रहा है।

मुख्यमंत्री ने की सराहना
उत्सव के दूसरे दिन गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत से इन कलाकारों की मुलाकात हुई। मुख्यमंत्री ने भांड–बहरूपिया कला की खुलकर सराहना करते हुए कहा कि,
“आपके परिवार ने जिस तरह इतनी पुरानी कला को आज भी जीवित रखा है, वह सराहनीय है। आपके दादाजी ने इस कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, इसके लिए मैं आपको बधाई देता हूं। गोवा में आयोजित होने वाले उत्सवों में आपकी कला को हमेशा अवसर दिया जाएगा।”

मुख्यमंत्री के इस आश्वासन से कलाकारों में नया उत्साह देखने को मिला।

बदलते जमाने की चुनौती
विक्रम भांड ने अपने मन का दर्द भी साझा किया। उन्होंने कहा कि एक समय था जब भांड–बहरूपिया ही मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करते थे। गांव-गांव, शहर-शहर लोग इनके आने का इंतजार करते थे। “आज मोबाइल, टीवी और इंटरनेट ने हमारी कला की जगह ले ली है। नई पीढ़ी स्क्रीन तक सीमित होती जा रही है, जिससे यह कला धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर है,” – विक्रम कहते हैं। हालांकि, इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भांड परिवार ने हार नहीं मानी। “जब तक रगों में सांसें हैं, तब तक इस कला को जिंदा रखेंगे। मरते दम तक लोगों के बीच जाकर उनका मनोरंजन करते रहेंगे,” – यह संकल्प उनकी आवाज में साफ झलकता है।

परंपरा में आधुनिकता का मेल
बदलते समय के साथ कलाकारों ने अपने किरदारों में भी नवाचार किया है। विक्रम भांड ने बताया कि आज की युवा पीढ़ी को जोड़ने के लिए उन्होंने राज कपूर के ‘मेरा नाम जोकर’, आमिर खान के ‘पीके’, अलादीन का जिन, चार्ली चैप्लिन, डाकू जबर सिंह, बंदर जैसे कई लोकप्रिय किरदारों को अपनी कला में शामिल किया है।
हर दिन नए-नए रूप धारण कर वे दर्शकों को चौंकाते और आनंदित करते हैं।

दुर्गा शंकर भांड बताते हैं, “हम करीब 56 अलग-अलग किरदार निभाते हैं। आज एक रूप, कल दूसरा और परसों कोई और। इसी वजह से हमें बहरूपिया कहा जाता है।”

देश-विदेश में कला का परचम
विक्रम भांड ने अब तक राजस्थान, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, तमिलनाडु, चेन्नई, हैदराबाद सहित कई राज्यों में अपनी कला का प्रदर्शन किया है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति देकर उन्होंने राजस्थान की लोकसंस्कृति को नई पहचान दिलाई है। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है।
अंत में विक्रम भांड ने गोवा सरकार और संस्कृति मंत्रालय से अपील की कि इस विलुप्त होती लोककला पर विशेष ध्यान दिया जाए और ऐसे राष्ट्रीय मंचों पर अधिक से अधिक अवसर दिए जाएं, ताकि नई पीढ़ी इस कला से परिचित हो सके और भांड–बहरूपिया कला आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।

 

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